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्रकृति न े मन ुष्य को सभी जीवनोपया ेगी संसाधन म ुक्त हस्त से प्रदान किये हैं। आदिमानव अपनी समस्त आवष्यकताओं की प ूर्ति के लिये प ूरी तरह प्रकृति पर निर्भर करता था, किंत ु आदि मानव से आध ुनिक मन ुष्य बनन े की विकासयात्रा म ें मन ुष्य न े प्राकृतिक संसाधनों का भरप ूर दोहन किया फलस्वरूप प्रकृति की अक ूत संपदा धीर े-धीर े समाप्त हा ेन े लगी। इस क्रम मे ं विभिन्न प्रजातियाँ विलुप्त प्रजातियो ं की श्रेणी में पहुँच गयी ं, शेष बची हुई प ्रजातिया ें और स्वयं मन ुष्य प ्रजाति को बचाये रखन े के लिय े भी प ्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण अत्यावष्यक हो गया है। इस हेत ु विभिन्न सुरक्षात्मक कदम उठान े के साथ-साथ आवष्यकता ए ेसे युवाआ ें की है जो प्रकृति के प ्रति संव ेदनषील हों तथा विषम परिस्थितिया ें में भी प्रकृति के सानिध्य में रहकर प ्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का उत्तरदायित्व निभान े म ें सक्षम हों। मन ुष्य आदिकाल से ही अपन े अस्तित्व के लिये प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहा है। मानवीय विकास क े प्रार ंभिक समय में वह अपनी समस्त आवष्यकता की प ूर्ति के लिये प ूर्ण रूप से प्राकृतिक संसाधनों का ही उपया ेग करता था। समय के साथ-साथ मन ुष्य का विकास हुआ। विकास के इस क्रम में वह स्वयं तथा प्रकृ ति के बीच अंतर्स ंबंध को भूलता गया। बढ ़ती ह ुई जनसंख्या तथा आधुनिकीकरण की अंधी दौड ़ में वह प ्राकृ तिक संसाधनों का अंधाध ुंध दोहन करन े लगा। प्रकृति पर विजय पान े की इच्छा न े मन ुष्य को स्वयं के ही विनाष की ओर ढकेल दिया। उसके कार्य कलापों न े अन ेक सजीवों का अस्तित्व ही सदा के लिये समाप्त कर दिया। जनसंख्या वृद्धि तथा औद्योगिकीकरण न े न केवल प्राकृतिक संसाधना ें को नष्ट किया बल्कि पर्यावरण को भी इस सीमा तक प्रद ूषित कर दिया है कि स्वयं मानव जाति के लिये भी गंभीर समस्याए ें उत्पन्न हो गयी हैं। यदि मन ुष्य इसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करता रहा तो उसकी स्वयं की प्रजाति का भी शन ै-षन ै विनाष हो जायेगा। स्वयं के अस्तित्व को बनाये रखन े के लिय े पर्या वरण तथा प्राकृतिक संसाधना ें का संरक्षण अत्यावष्यक है।
प्राकृतिक संसाधन एव ं उनका संरक्षण
प्राकृतिक संसाधन एव ं उनका संरक्षण
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