
यह शोध पत्र 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत के दौर में स्वामी विवेकानंद के 'आध्यात्मिक राष्ट्रवाद' का विश्लेषण करता है। ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक संकट के बीच, विवेकानंद ने राजनीति से परे जाकर राष्ट्रवाद का एक व्यावहारिक खाका खींचा। वेदांत दर्शन पर आधारित उनके इस राष्ट्रवाद के चार मुख्य स्तंभ थे—अध्यात्म, सामाजिक सुधार, आधुनिक शिक्षा और नि:स्वार्थ सेवा। 1893 के शिकागो भाषण के जरिए उन्होंने वैश्विक मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया, तो दूसरी ओर 'नर सेवा को नारायण सेवा' मानकर वंचितों के उत्थान और लैंगिक समानता पर जोर दिया। वे वैज्ञानिक सोच और नैतिक मूल्यों से जुड़ी शिक्षा के पक्षधर थे, ताकि देश को चरित्रवान युवा मिल सकें। संक्षेप में, उनका राष्ट्रवाद संकीर्णताओं से दूर एक ऐसा ढांचा है, जो अपनी जड़ों से जुड़कर भी वैश्विक मूल्यों का स्वागत करता है। उनका यह दृष्टिकोण आज भी गरीबी, विषमता और सांप्रदायिक तनाव से निपटने तथा एक सशक्त राष्ट्र बनाने के लिए हमारा मार्गदर्शन करता है।
