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Article
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वैदिक और लौकिक ज्ञान का समन्वय : गुरुकुल एवं प्राचीन विश्वविद्यालयों की परंपरा

Authors: डॉ. नागेंद्र सिंह यादव;

वैदिक और लौकिक ज्ञान का समन्वय : गुरुकुल एवं प्राचीन विश्वविद्यालयों की परंपरा

Abstract

वैदिक और लौकिक ज्ञान का समन्वय : गुरुकुल एवं प्राचीन विश्वविद्यालयों की परंपरा भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली एक समग्र एवं जीवनोपयोगी व्यवस्था थी, जिसमें ज्ञान को मानव जीवन का अभिन्न अंग माना गया था। यह प्रणाली केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा व्यापक दृष्टिकोण के विकास पर आधारित थी। गुरुकुल व्यवस्था इस शिक्षा प्रणाली का मूल आधार थी, जिसमें व्यक्तिगत मार्गदर्शन, आत्मानुशासन, गुरु-शिष्य संबंध तथा अनुभवात्मक शिक्षण को विशेष महत्व दिया जाता था। इस पद्धति में शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना था। प्राचीन भारत में वैदिक एवं लौकिक ज्ञान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। जहाँ एक ओर वेद, उपनिषद, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन का अध्ययन कराया जाता था, वहीं दूसरी ओर चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, राजनीति, व्याकरण, न्यायशास्त्र तथा अन्य व्यावहारिक विषयों को भी समान महत्व दिया जाता था। यही कारण है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली ज्ञान के विविध आयामों को एकीकृत रूप में प्रस्तुत करती थी। Nalanda University भारतीय दर्शन, विशेषकर महायान बौद्ध चिंतन, तथा विभिन्न विज्ञानों के अध्ययन का प्रमुख केंद्र था। यहाँ विशाल पुस्तकालय, अंतरराष्ट्रीय छात्रावास, सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम तथा वैश्विक शैक्षणिक संवाद की समृद्ध परंपरा विद्यमान थी। नालंदा की शैक्षणिक संरचना आधुनिक विश्वविद्यालयों की अवधारणा से भी अत्यंत उन्नत मानी जाती है। Takshashila में ब्रह्मविद्या से लेकर खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, चिकित्सा, राजनीति तथा सैन्य शिक्षा तक के विविध विषय पढ़ाए जाते थे। यहाँ के प्रसिद्ध विद्वानों में Chanakya, Jivaka तथा Vatsyayana का विशेष स्थान है, जिन्होंने भारतीय एवं विश्व इतिहास को महत्वपूर्ण दिशा प्रदान की। Vikramashila University ने बौद्ध तांत्रिक परंपरा तथा लौकिक ज्ञान के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। यहाँ की प्रवेश प्रणाली अत्यंत कठोर थी तथा द्वारपाल आचार्य व्यवस्था शिक्षा की उच्च गुणवत्ता का प्रतीक मानी जाती थी। विशेष रूप से Atisha Dipankara Shrijnana जैसे आचार्यों ने तिब्बती बौद्ध परंपरा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन प्राचीन संस्थानों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भारत की शिक्षा प्रणाली किसी संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं थी, बल्कि विज्ञान, चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, न्याय, व्याकरण और तर्कशास्त्र जैसे विषयों को भी समान महत्व प्रदान करती थी। यह शिक्षा व्यवस्था विचारों की बहुलता, संवाद की स्वतंत्रता तथा अनुसंधान की प्रवृत्ति पर आधारित थी। वर्तमान समय में जब नई शिक्षा नीति, बहुविषयी शिक्षा, कौशल विकास तथा वैश्विक ज्ञान-आधारित समाज की चर्चा हो रही है, तब गुरुकुल परंपरा और प्राचीन विश्वविद्यालयों के अनुभव अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध हो सकते हैं। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत विरासत हैं, जिनसे आज की शिक्षा व्यवस्था को दिशा और प्रेरणा प्राप्त हो सकती है। अतः यह कहा जा सकता है कि वैदिक और लौकिक ज्ञान के समन्वय पर आधारित भारतीय शिक्षा परंपरा मानव-केंद्रित, मूल्यपरक और समग्र शिक्षा का आदर्श मॉडल प्रस्तुत करती है। वर्तमान वैश्विक शैक्षिक चुनौतियों के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है।

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