
डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी आधुनिक हिंदी आलोचना के वरेण्य आलोचकों में से एक हैं। वे साहित्यचिंतन के अपने विशदकार्य को आगे चलकर साहित्येतिहास लेखन के रूप में व्यवस्थित स्वरूप भी प्रदान करते हैं। वे साहित्य के इतिहास को राजाओं, देववंशों व युद्धों का विवरण मात्र नहीं मानते हैं। वे साहित्य के इतिहास को समाज की भाषा के बदलते हुए संवेदनात्मक धरातल पर रखने का आग्रह करते हैं। उनका भक्तिकाव्य विषयक चिंतन परंपरागत साहित्येतिहास चिंतन की परंपरा में विशिष्ट स्थान का अधिकारी है। वे भक्तिकाल को सामाजिक निराशा, पराजय या धर्मोन्मेष के अतिरिक्त सामाजिक-सांस्कृतिक व भाषिक पुनर्जागरण की व्यापक पृष्ठभूमि पर स्थापित करते हैं। वे भक्तिकाव्य के उदय व विकास की जड़े तत्कालीन समाज की आवश्यकता में देखते हैं।
