Powered by OpenAIRE graph
Found an issue? Give us feedback
image/svg+xml art designer at PLoS, modified by Wikipedia users Nina, Beao, JakobVoss, and AnonMoos Open Access logo, converted into svg, designed by PLoS. This version with transparent background. http://commons.wikimedia.org/wiki/File:Open_Access_logo_PLoS_white.svg art designer at PLoS, modified by Wikipedia users Nina, Beao, JakobVoss, and AnonMoos http://www.plos.org/ ZENODOarrow_drop_down
image/svg+xml art designer at PLoS, modified by Wikipedia users Nina, Beao, JakobVoss, and AnonMoos Open Access logo, converted into svg, designed by PLoS. This version with transparent background. http://commons.wikimedia.org/wiki/File:Open_Access_logo_PLoS_white.svg art designer at PLoS, modified by Wikipedia users Nina, Beao, JakobVoss, and AnonMoos http://www.plos.org/
ZENODO
Article
Data sources: ZENODO
addClaim

कल्याणकारी राज्य की स्थापना में जैन साहित्य का योगदान : एक अध्ययन

Authors: डॉ. ज्योति गौतम;

कल्याणकारी राज्य की स्थापना में जैन साहित्य का योगदान : एक अध्ययन

Abstract

भारतीय चिंतन परंपरा में कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा का मूल उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, सामाजिक न्याय, समानता तथा मानव कल्याण की स्थापना करना है। जैन साहित्य ने इस अवधारणा को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया है। जैन साहित्य में वर्णित अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद, सत्य तथा करुणा जैसे सिद्धांत सामाजिक समरसता एवं जनकल्याणकारी व्यवस्था के निर्माण में सहायक सिद्ध होते हैं। जैन आचार्यों ने मानव जीवन को नैतिकता, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक विकास से जोड़ते हुए सामाजिक कल्याण की अवधारणा को विकसित किया। जैन दर्शन का मूल उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, सह-अस्तित्व और उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करना है। यही भावना एक आदर्श कल्याणकारी राज्य की आधारशिला मानी जा सकती है। तत्त्वार्थसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र— “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” (जीव एक-दूसरे के सहायक हैं)— सामाजिक सहयोग, पारस्परिक निर्भरता तथा कल्याणकारी व्यवस्था की आधारभूमि प्रस्तुत करता है। यह सिद्धांत समाज में सहकार, समन्वय तथा लोकमंगल की भावना को सुदृढ़ करता है। जैन साहित्य में वर्णित नैतिक मूल्यों के माध्यम से सामाजिक न्याय, आर्थिक संतुलन, अहिंसक जीवन-पद्धति, संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग तथा मानव-कल्याण की व्यापक अवधारणा को बल मिलता है। विशेष रूप से अपरिग्रह का सिद्धांत उपभोग की सीमा निर्धारित कर सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को कम करने की प्रेरणा देता है। अतः यह कहा जा सकता है कि जैन साहित्य में निहित मानवीय, नैतिक एवं सामाजिक मूल्य कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक हैं। जैन दर्शन के सिद्धांत सामाजिक सद्भाव, नैतिक शासन, जनकल्याण और सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जैन साहित्य भारतीय कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

Powered by OpenAIRE graph
Found an issue? Give us feedback