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Article
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भारतीय समाज पर वैश्वीकरण का प्रभाव (युवाओं और महिलाओं के विशेष सन्दर्भ में)

Authors: डॉ. अनुपम सिंह;

भारतीय समाज पर वैश्वीकरण का प्रभाव (युवाओं और महिलाओं के विशेष सन्दर्भ में)

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र "भारतीय समाज पर वैश्वीकरण का प्रभाव : युवाओं और महिलाओं के विशेष सन्दर्भ में" वैश्विक एकीकरण की प्रक्रिया से उत्पन्न सामाजिक–सांस्कृतिक परिवर्तनों का गहन विश्लेषण करता है। 1991 के आर्थिक सुधारों के पश्चात्, वैश्वीकरण ने भारतीय समाज के पारंपरिक ढाँचे को आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के नए आयामों से जोड़ दिया। यह शोध विशेष रूप से भारतीय युवाओं और महिलाओं पर केन्द्रित है, क्योंकि ये दोनों वर्ग वैश्वीकरण के सबसे प्रत्यक्ष ग्राहक रहे हैं। युवाओं के सन्दर्भ में, वैश्वीकरण ने जहाँ एक ओर शिक्षा, तकनीक और वैश्विक रोजगार के असीमित अवसर प्रदान किए हैं, वहीं दूसरी ओर 'पश्चिमीकरण' और 'उपभोक्तावाद' के कारण उनके सांस्कृतिक मूल्यों और पहचान में एक द्वंद्व भी उत्पन्न किया है। डिजिटल क्रांति ने युवाओं को 'वैश्विक नागरिक' के रूप में स्थापित किया है, जिससे उनकी आकांक्षाएँ और जीवनशैली वैश्विक मानकों के अनुरूप बदली हैं। महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में, वैश्वीकरण ने आर्थिक सशक्तिकरण, श्रम बाज़ार में बढ़ती भागीदारी और सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूकता के माध्यम से पितृसत्तात्मक बाधाओं को चुनौती दी है। हालाँकि यह शोध इस चिन्ता को भी रेखांकित करता है कि वैश्वीकरण के लाभ शहरी क्षेत्रों तक अधिक केन्द्रित हैं, जिससे 'डिजिटल विभाजन' और 'आर्थिक असमानता' जैसी चुनौतियाँ उभर रही हैं। वैश्वीकरण एक 'दुधारी तलवार' की भाँति है, जिसने सशक्तिकरण और प्रगति के द्वार तो खोले हैं, किन्तु सांस्कृतिक विखण्डन और सांस्कृतिक क्षरण के ख़तरों को भी जन्म दिया है।

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