
कृष्णा सोबती हिंदी साहित्य की एक ऐसी सशक्त और निर्भीक रचनाकार हैं, जिन्होंने स्त्री जीवन की जटिलताओं, उसकी अस्मिता और उसकी दबी हुई यौनिक इच्छाओं को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया। उनके उपन्यासों में स्त्री केवल परिवार की परिधि में सीमित पात्र नहीं है, बल्कि वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है जो अपने अस्तित्व, स्वाभिमान और यौन स्वाधीनता के लिए संघर्ष करती है। प्रस्तुत शोध-लेख में कृष्णा सोबती के प्रमुख उपन्यासों— मित्रो मरजानी, ज़िंदगीनामा और सूरजमुखी अँधेरे के — के आधार पर स्त्री चेतना और यौन स्वाधीनता के विविध आयामों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि सोबती का लेखन पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देते हुए स्त्री को आत्मनिर्णय और देह-बोध की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह शोध यह भी प्रतिपादित करता है कि कृष्णा सोबती का साहित्य केवल स्त्री-वेदना का चित्रण नहीं करता, बल्कि वह स्त्री की चेतना, प्रतिरोध और आत्मस्वीकृति की प्रक्रिया को रेखांकित करता है। उनके उपन्यासों की नायिकाएँ सामाजिक रूढ़ियों और नैतिक मान्यताओं से टकराते हुए अपनी इच्छाओं को व्यक्त करती हैं और इस प्रकार वे परंपरागत स्त्री-छवि को पुनर्परिभाषित करती हैं। प्रस्तुत अध्ययन में नारीवादी चिंतन की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि के आलोक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार सोबती ने स्त्री देह को शर्म या पाप का विषय न मानकर उसे मानवीय अस्तित्व का स्वाभाविक अंग माना है। उनके लेखन में यौन स्वाधीनता का अर्थ सामाजिक उच्छृंखलता नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्णय का अधिकार है। यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि कृष्णा सोबती के उपन्यास हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श की एक सशक्त धारा का निर्माण करते हैं। उनका साहित्य न केवल पितृसत्ता की संरचनाओं को प्रश्नांकित करता है, बल्कि स्त्री को उसकी सम्पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ स्थापित करता है।1 इस प्रकार, सोबती का लेखन समकालीन समाज में लैंगिक समानता और स्त्री-अधिकारों की बहस को गहराई प्रदान करता है तथा हिंदी उपन्यास परंपरा को नवीन दृष्टि से समृद्ध करता है।
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