
भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। इन गाँवों की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। कृषि ही जीविकोपार्जन का मात्र साधन ही नहीं बल्कि एक प्राचीनतम उद्यम है। देश के विकास में कृषि को सर्वाधिक प्राथमिकता की आवश्यकता है। आर्थिक विकास के दृष्टि से देश के सभी वर्ग कृषि पर निर्भर है। लेकिन उच्च वर्ग की निर्भरता की अपेक्षा निम्न वर्ग की निर्भरता अधिक है जो गांवो में निवास करतें हैं। भारत में अनुकूल भौगोलिक दशाओं के कारण प्राचीन काल से ही कृषि आर्थिक क्रियाकलाप का आधार-भूत स्त्रोत रही है। पिछले दशकों में औद्योगीकरण के संगठित प्रयास के बावजूद कृषि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कृषि न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है वरन् मानव वसाव तथा सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप का भी आधारशिला है। भारत का सम्पूर्ण अर्थतंत्र कृषि पर आश्रित है। राष्ट्र की सम्पूर्ण आय का लगभग 50 प्रतिशत भाग कृषि से प्राप्त होता है। कार्यशील जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत कृषि में संलग्न है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय निर्बल औद्योगिक संरचना, परम्परागत अक्षम कृषि प्रणाली और विकृत भू-स्वामित्व ढाँचे के कारण देश की आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त क्षीण थी। निम्नस्तरीय कृषि वृद्धि दर और वृद्धिमान जनसंख्या के कारण अत्यन्त जर्जर हो गयी थी। ऐसी परिस्थिति में वर्ष 1951-52 में नियोजित विकास प्रक्रिया प्रारम्भ की गयी ताकि कृषि और उद्योग में वृद्धि के साथ-साथ रोजगार की सम्भावनाए बढे़ तथा आय, संपत्ति और उपभोग स्तर में व्याप्त विषमता कम हो। सन् (1951) में प्रारम्भ की गयी प्रथम दो योजनाओं (1951-52 से 1961-62) में कृषि विकास के आधारभूत घटकों तथा सिंचाई उर्वरक उत्पादन व कृषि यंत्र तथा परिवहन को व्यवस्थित करने के लिए आधारभूत उद्योग जैसे लोहा-इस्पात खनिज शोधन, कृषि यंत्र आदि को विकसित किया गया। द्वितीय पंचवर्षीय योजना के बाद कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए हरित क्रान्ति जैसी महत्वाकांक्षी योजना प्रारम्भ की गयी, जिसमें कृषि के विकास के लिए हर प्रकार के अवस्थापना के तत्वों के विकास की योजनाओं को क्रियान्वित किया गया, जिसका एक अच्छा परिणाम भी दृष्टिगत हुआ क्योंकि स्वतन्त्रता प्राप्ति के वर्ष में 510 लाख टन खाद्यान्न उत्पादन से बढ़कर वर्ष 1983-84 तक 1500 लाख टन हो गया। स्वतंत्रता के तत्पश्चात् कृषि विकास के लिए जो पंचवर्षीय योजनाओं का क्रियान्वन किया गया था उससे अवस्थापना तत्वों के विकास एवं विस्तार के कारण कृषि के उत्पादन में ही नहीं, बल्कि कृषि के वाणिज्यीकरण को भी प्रोत्साहन मिला। साथ-साथ भारतीय कृषकों को यह विश्वास हुआ कि कृषि कार्य केवल जीविकोपार्जन ही नहीं, अपितु व्यापार को भी बढ़ावा देता है।
