
कला की उत्पत्ति अति प्राचीन काल से मानी गयी है। कला का प्रारंभिक स्वरूप हमें प्रागैतिहासिक काल की कलाओं में देखने को मिलते हैं। मनुष्य का विकास जैसे-जैसे होता गया मनुष्य और सभ्य बनता गया।उसी प्रकार कला भी समय के साथ धीरे-धीरे अपना विकसित रूप ग्रहण करने लगी, जो आगे चलकर स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला एवं संगीत कला आदि इन रूपों में सामने आई। इस प्रकार और विचार धाराओं का विकास हुआ। भारतीय कला में धार्मिक तथा दार्शनिक मान्यताओं की अभिव्यक्ति से ही की गई है फिर चाहे वह प्रस्तर कालीन कला हो या सिंधु घाटी सभ्यता, लघु चित्रण परम्परा या वैदिक काल से जुडी परम्पराओं से सम्बंधित कला, भवन हो या अत्याधुनिक समकालीन कला मानव आदिकाल से ही प्रकृति व ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए निरंतर प्रयास करता रहा है। विजय, उल्लास, इच्छा, उदासीनता, आनन्द आदि मनोभावों को उसके सृजनशील मन से विभिन्न विधाओं व अनेक माध्यमों में अभिव्यक्ति किया। कला जीवन की स्थानापन्न है अथवा आसपास की दुनिया से मनुष्य का संतुलन स्थापित करने वाला साधन है। इस विचार में कला के स्वरूप और उसकी जरूरत की आंशिक पहचान निहित है। कलाकार होने के लिए अनुभव को पकड़ना उस पर अधिकार करना, उसे स्मृति में रूपांतरित करना और स्मृति को अभिव्यक्ति में वस्तु के रूप में रूपांतरित करना आवश्यक है। कला रूपों का निर्माण करती है। समग्र रूप राशि ही कला है। कला के प्रांगण में स्वर्ग के देव दूत तक संयम मर्यादा का संदेश लेकर निरंतर धरती पर उतरते रहे हैं। किसी भी देश की संस्कृति का दर्पण वहां की कला होती हैं, जैसे- भारतीय कला भी यहां के जीवन का दर्पण है। भारत में देखा जाए तो धर्म तथा दर्शन, अर्थ तथा काम, सौंदर्य तथा कुरूपता एवं बौद्धिकता, प्रकृति तथा दृश्य, राजा तथा प्रजा, युद्ध एवं शांति, स्वामी तथा सेवक, जड़ एवं चेतन, श्रमजीवी तथा बुद्धिजीवी, दर्शनों की गंभीरता और विद्युत की हास्य व्यंग सदाचार का आदर्श तथा विषयों का चरम विलास, योग तथा भोग ,चरम तथा निराशा एवं प्रखर कला विलास इत्यादि देखने को मिलते हैं।
