
शोध सार - हाशिए का समाज सत्ता और अधिकार के द्वंदात्मक प्रतिक्रिया का प्रतिफलन है । जिसमे द्विधारी प्रतिपक्ष समानांतर रूप से कार्य करती है, इसका प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से साहित्य, समाज, दर्शन पर पड़ता है । राजनीतिक सत्ता, सामाजिक सत्ताधारी वर्चस्व, सांस्कृतिक और आर्थिक हनन जीवन से टकराती है । दोहरी चेतना का निर्माण करती है । वर्णभेद और अर्थभेद की दमनकारी नीतियों को जन्म देती है । हिंदी साहित्य में मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, नागार्जुन, यशपाल, महादेवी वर्मा ने हाशिए के ऐसे समाज को साहित्य का विषय बनाया । समाज में विघटन की प्रक्रिया आरंभ हुई जिसके परिणामस्वरूप अतिवाद की संरचना मलयालम, तेलगू, गुजराती, और मराठी के उत्तर आधुनिक विमर्श के साहित्य प्रखर हुई । जिसमें बेचैनी, हताशा, ह्रास, तनाव, अलगाव, व्यग्रता, अशांत शारीरिक कलेश, आस्थायीपन, प्रकृति आदि प्रमुख रूप से केंद्र में रही । साहित्य में नग्न यथार्थ का चित्रण आरंभ हुआ । स्वयं की दशा का चित्रण, प्रत्येक क्षण का चित्रण प्रमुख हो गया । किसान मजदूर बनने लगे, स्त्री स्वतंत्र पहचान बनने लगी, आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुए, कुरीतियों का खंडन किया जाने लगा । वर्चस्ववादी मानससिक्त में शिथिलता आने लगी । बीज शब्द - मूल्य मीमांसा, सीमांत आदमी, अधिकारमूलक समस्या, सत्ताधारी वर्चस्व, बाजारवाद, वर्णभेद और अर्थभेद, विघटन प्रक्रिया, संरचनात्मक विघटन
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