
स्वातंत्र्योत्तर काल में भारत में कृषि क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। आज़ादी के समय जहाँ भारत को “भोजन की गंभीर कमी वाले राष्ट्र” के रूप में देखा जाता था और उसे अपनी खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं 1960 के दशक के दौरान हरित क्रांति ने देश को आत्म-निर्भर बनाने के साथ ही “खाद्य-अधिशेष राष्ट्र” का दर्ज़ा दिलाने में मदद की। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि और समग्र विकास में कृषि की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। हालाँकि नित्य-प्रति बदलते परिवेश और आवश्यकताओं को देखते हुए इस भूमिका को पुनर्परिभाषित एवं क्रियान्वित किए जाने की आवश्यकता है जिससे कि 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना और नए अवसरों का दोहन किया जा सके। कार्य-बल में वृद्धि एवं विनिर्माण क्षेत्र में अधिक रोज़गार सृजन न हो पाने की स्थिति में कृषि क्षेत्र का महत्त्व और भी बढ़ गया है। ऐसे में कृषि क्षेत्र में लाभकारी रोजगार के नए अवसर तलाशने की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ यद्यपि कुछ क्षेत्रों एवं राज्यों में प्रभावशाली होने के बावजूद भी क्षमता से कम रही हैं। हम आम तौर पर अपने समकालीन भोजन की स्थिति की तुलना 1960 के दशक के मध्य में भोजन की कमी की स्थिति से करते हैं और इस बात से संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं कि अब हमें भोजन की कमी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। जबकि कृषि क्षेत्र की उपलब्धियों की तुलना चुनौतीपूर्ण मानदंडों के आधार पर भारत के अन्य क्षेत्रों जैसे अंतरिक्ष, सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, सेवाओं एवं ऑटोमोबाइल, चिकित्सा विज्ञान, परिवहन आदि क्षेत्रों की उपलब्धियों से या अन्य राष्ट्रों की उपलब्धियों से की जानी चाहिए।
History
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