
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Anthology The Research" URL : http://socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=9137 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International) Abstract : प्रेमचंद का साहित्य पाठकों की भावनाओं को जाग्रत करता है और सिनेमा भी दर्शक समाज के साथ अपना भावात्मक संबंध स्थापित करता है और जब प्रेमचंद की रचनाएं सत्य शिव सुंदरम को फिल्म के जरिए हमारे सामने लाती हैं तब सामाजिक जीवन का सत्य जिसमे कष्ट भी है , समस्याएं भी, आनंद भी, संघर्ष भी, जीने की इच्छा ये सब हमें चरित्रों के माध्यम से प्रेमचंद की कहानी और उपन्यासों से निकलकर फिल्म की स्क्रीन पर जीवंत हो उठते हैं। प्रेमचंद का पराधीन, निर्धन, निरक्षर भारत का सच नजदीक से दिखाई देने लगता है। प्रेमचंद अपने साहित्य में साम्राज्यवाद, सामंतवाद, उपनिवेशवाद, जमींदारी प्रथा, महाजनी प्रथा, जातिवाद, पूंजीवाद के जिस भयंकर और कुत्सित रूप का विरोध और प्रतिरोध कर रहे थे वही जब सन् 1934 में निर्देशक मोहन भावनानी के द्वारा ’मिल मजदूर’ के नाम से या सन् 1963 में श्रीलोक जेटली के निर्देशन पर ’गोदान’ के नाम से या 1959 में ’दो बैलों की कथा’ पर आधारित ’हीरा मोती’ फिल्म के नाम से या सन् 1977 में सत्यजीत राय के निर्देशन पर “शतरंज के खिडाली” फिल्म के नाम से या सन्1977 में मृणाल सेन के निर्देशन पर तेलुगु भाषा में ‘कफ़न’ पर आधारित ‘ओका उरी की कथा’ फिल्म के नाम से या सन्1981 में सत्यजीत रॉय के निर्देशन पर ‘सद्गति’ फिल्म के नाम से या सन् 1938 में कृष्णस्वामी सुब्रमण्यम के निर्देशन पर ‘सेवा सदन’ फिल्म के नाम से फिल्माया गया तब प्रेमचंदद्वारा निर्मित चरित्र मानो और ज्वलंत होकर हमारे सामने बोलने लगे। सिनेमा की शक्ति से प्रेमचंद को इन्कार नहीं था। वे सिर्फ अच्छे विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार चाहते थे चाहे वह साहित्य हो या सिनेमा। एकतरफ जहां वे ‘कजली’ जैसे मनोरंजन करने वाली पुस्तक हैं की कटु आलोचना करते है और उसे साहित्य में शामिल नहीं करते वहीँ दूसरी तरफ वे उस सिनेमा की शक्ति को स्वीकार करते हैं जो आदर्श चरित्रों की सृष्टि करने में सक्षम हो । वस्तुतः प्रेमचंद ने अपने समय के सामाजिक - राजनीतिक - सांस्कृतिक विघटन को साहित्य के माध्यम से कोशिश की है। । मनुष्योन्मुखी संवेदना का विकास उनकी रचनाओं का मूल विषय है जिसके परिणाम- स्वरूप उनका सौन्दर्यबोध और उनकी सौन्दर्य - दृष्टि उनके साहित्य - चिन्तन के स्तर पर फलीभूत होती दिखाई देती है। मनुष्य के संबंधों को मजबूत बनाना प्रेमचंद के रचना - कार्य का ध्येय रहा है और जब यह सिनेमा के साथ जुड़कर सामने आता है तब विघटित समय का प्रत्येक मोड़ जीवंत होकर हमारे रोम-रोम को स्पर्श करता है और हम उसी दिशा में उनके आदर्शोन्मुखी और यथार्थोंमुखी चरित्रों की और उन्मुख होते हुए भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्पाठ करने लगते हैं और प्रेमचंद द्वारा दिये गये नये सौन्दर्यशास्त्रीय आयाम से जुड़ जाते हैं |
दलित, महाजनी प्रथा,, प्रतिबंधित,, पात्र-योजना,, सामंतवाद, प्रतिबिम्ब, उत्पीड़न, निर्देशित, उपनिवेशवाद, स्त्री-मनोविज्ञान।, जातिवाद, दृश्य - श्रव्य माध्यम, यथार्थवाद, आदर्शवाद, प्रतिरोध, फिल्मांकन, संलाप, प्रतिबद्ध, कल्पनाशीलता, पूंजीवाद, जमीन्दारी प्रथा, कथा-विन्यास,, बौद्धिक, प्रगतिशील, वितान
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